New Year - नववर्ष:-


नववर्ष हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है जैसे जैसे हम आपने जीवन मे आगे बढ़ते हैं और प्रत्येक क्षण जो भी कार्य करते हैं वह सब कुछ तिथियों को ले कर यादों में बन जाता है यां फिर कोई भी कार्य करने हेतु निश्चित समय वं दिनांक दी जाती है यह समय सीमा को काल तालिका द्वारा दर्शाया जाता है उसे कलेंडर अथवा वर्ष तालिका कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष तालिक का एक आरम्भ माह एवं दिनांक होती है जिससे हमें बदलते समय का ज्ञात होता है। उसे नववर्ष कहा जाता है।

वैज्ञानिक रूप से

अगर हम वैज्ञनीक रूप से नववर्ष को देखें तो नव वर्ष भाव नया वर्ष वो समय जब कुछ बदलाव हो अथवा आरम्भ हो। अतः जब सृष्टि अथवा वातावरण में सकारात्मक बदलाव हों उस समय को नववर्ष भाव नया आरंभ कहा जा सकता है।  उदाहरण हेतु जब वातावरण स्वयं को पुनः विस्थापित करे जिसमे नवजीवन उत्त्पन्न हो।

धार्मिक रूप से

धार्मिक रूप से भी नववर्ष धार्मिक मान्यताओं से मनाया जाता है प्रत्येक धर्म अपना नववर्ष अपने इष्ट को याद कर आरम्भ करता है तथा प्रत्येक धर्म का अपना इतिहासिक नववर्ष होता है जबसे वह धर्म उत्तपन हुआ हो। उदाहरण स्वरूप ईसाई धर्म को आज के समय मे 2020 साल हुए हैं जिसका महोत्सव पूरे विश्व मे मनाया जा रहा है। वहीं अगर हम वैदिक धर्म वं सनातन धर्म की बात करें तो केवल वेदों को लिखे 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हज़ार 119 साल हो चुके हैं भाव सनातन धर्म के अनुसार युगों पूर्व नववर्ष की परम्परा रही है। जो कि विज्ञानिक तथ्यों पर भी साक्ष्य देती है।  जिसके अनुसार सूर्य और पृथ्वी के उद्भव की भी व्याख्या एवं आपस मे सम्बंद के साक्ष्य हैं।

शासन के आधीन

कुछ नववर्ष शासन वं आधिकारिक रूप से भी मनाए जाते हैं जिसमे उनका नववर्ष तह समय सीमा के अनुसार होता है तथा अपने उच्च अधिकारियों के आदेशों अनुसार वं शासक के अनुसार मनाया जाता है उदाहरण हेतु भारत मे मनाया जाने वाला ईसा नववर्ष जो कि 1 जनुअरी से आरम्भ होता है वास्तव में ब्रिटिश शासकों की देन है जो कि हमारे भारतीयों पर कूटनीति वं बल पूर्वक थोपा गया और कई पीढ़ियों में ईसा नववर्ष को रखने के पश्चात आज भारत एवं भारत जैसे कई गुलाम से गुजरे देशों में यह नववर्ष मनाया जाता है। अधिकांश ईसाई होने के कारण भी यह नववर्ष पूरे विश्व में मनाया जाता है ।


कब कैसे और क्यों मनाना चाहिए

उपरोक्त भाग में हमने बताया कि नववर्ष क्या है और कैसे मनाया जाता है। अगर हम बात करें कि नववर्ष कब और क्यों मनाना चाहिए तो इसमें विज्ञानिक वं  प्राचीनतम संस्कृति के अंश मिलेंगे। तो आएं आरंभ करते हैं कब से। 
तो दोस्तो जैसे ऊपर बताया की नव भाव नया भाव जब कुछ नया हो और खुशी तब मनाई जाती है जब वो नया सकरात्मक हो। भाव कुछ फलदायक हो। तो इस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र में कुछ बदलाव तो आते रहते हैं परन्तु सकरात्मक बदलाव वर्ष में एक बार ही आते हैं और यह उस क्षेत्र के सकरात्मक वं नव जीवन हेतु बदलते वातावरण और आधारित होता है। 
यहां अगर हम विज्ञान की बात करें तो जीवन उत्पन्न होने हेतु ठंड की समाप्ति वं सूर्य की किरणों द्वारा होने वाले शुद्दिकरण के समय को वातावरण में सकरात्मक बदलाव कहेंगे। 
आगे बढ़ने से पुर्व हम हिम और उष्म थोड़ा समझ लें। हिम भाव ठंडा जिससे समस्त संसार जम जाता है तथा स्थिरता में कई प्रकार के जीवाणु वं अशुध्दता का विकास होता जो बीमारियों को उत्पन्न वं फैलाने में सहायक होती है। इसके विपरीत उष्णता सभी प्रकार की कृमियों को समाप्त करने हेतु कार्य करती है तथा ऊर्जा के प्रवाह से पेड़ वं पौधे अपना भोजन तैयार करते हैं वहीं इनसे प्राप्त भोजन को पचाने हेतु भी ऊर्जा का ही प्रयोग होता है।
अतः नववर्ष में जीवन व्यापण हेतु तत्वों वं वातारण का बदलाव होना अतिआवश्यक है। इस लिए नववर्ष तब मनाना चाहिए जब बदलाव सकरात्मक हों। जैसे भारत मे भर्तीयक नववर्ष 1 चैत्र शुक्लपक्ष को मनाया जाता है क्योकि पौष माह में भारत में ठंड रहती है और ठंड में बीमारियों का फैलना अधिक होता है तथा जीवन वयापक सामग्री भी कम उपलब्ध होती है और वातावरण नही अनुकूल नही होता जबकि चैत्र माह में न पतझड़ होती और न ठंड अतः पेड़ पौधे खिल उठते, जीव जंतु अपने अनुकूल वातावरण प्राप्त करते हैं। 
नववर्ष क्यों और कैसे मनाना चाहिए  के विषय मे अगर बात करें तो हम हर त्योहार को उत्साह पूर्वक मानते हैं क्योंकि उससे सकरात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और हम नव जीवन की ओर अग्रसर होते हैं।
इस विषय मे सम्पूर्ण जानकारी हमें हमारे वेदों से प्राप्त होती है जिनके अनुसार पौष का माह बहुत ही सर्द होता है तथा इसमें जीवन थम जाने वाला हो जाता है अतः इस ऋतु वं माह में कौनसा भोजन वं कार्यक्रम करने चाहिए यह सब वर्णित है परन्तु हम अधिक इस विषय पर बात न कर एक उदाहरण से बात स्पष्ट कर देते हैं सर्द में पेड़ पौधों को क्षति पहुंचती है यही नही मनुष्य वं पशु जीवन भी ठंड से थम जाता है ठंड से कई लोगों की मृत्यु भी हो जाती है यही नही खाने हेतु पर्याप्त मात्रा में खाद्य पदार्थ भी उपलब्ध नही होते पीने हेतु पानी के भी जलाशय जम जाने की कगार पर होते है अतः इस मौसम में सकरात्मक ऊर्जा का अभाव होता है जिस कारण रोगों का उत्तपन होना सामान्य हो जाता है इतने रोगों के बीच कौनसा उत्साह मनाया जाता है जब किसान परेशान फसल से, सामान्य मनुष्य परेशान आवास वं जल आहार के लिए। इसके विपरीत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को नव वर्ष मनाया जाता है क्योंकि उस समय वातावरण में बदलाव आने लगता हैं, सर्द ऋतु अपना असर छोड़ देती है और पेड़ पौधों पर नव बीज और शिखाएं उत्पन्न होने लगती है तथा जीवन का आरम्भ होने लगता है। 
अतः नववर्ष हमे नव सकरात्मक ऊर्जा के साथ वातावरण में बदलाव के साथ मनाना चाहिए क्योकिं तब ऋतु परिवर्तन के साथ साथ नव जीवन भी आरम्भ होने लगता है। 
अब विषय है कैसे मनाना चाहिए तो नववर्ष सदैव अपने इष्ट आराध्यों को याद करते हुए ज्योति एवं अग्नि को उत्पन्न करके बढ़े हुए रोगात्मक कीटाणुओं का शमन करते हुए मनाएं। घर को साफ करें आस पास साफ करें, पेड़ पौधों जो आपको शुद्ध वायु प्रदान करते वं भोजन देते उनका धन्यवाद करें तथा उनकी पूजा करें अथवा और पेड़ पौधों को लगाएं, माता पिता एवं बढ़े बज़ुर्गों का आश्रीवाद ले कर घर पर सकरात्मक ऊर्जा हेतु यज्ञ करवाएं। इस प्रकार कई सकरात्मक कार्यो से आप नववर्ष मना सकते हैं। नववर्ष पर उपहार में तुलसी का पौधा वं यज्ञकुंड, आदि भेंट करें तथा तिलक आदि संस्कार अवश्य करें।

नववर्ष से जुड़े भारतीय कर्म

भारत मे बहुत से कार्य ऐसे हैं जो भारतीय नववर्ष से जुड़े हैं चाहे वो धीरे धीरे कम होते जा रहे हैं परन्तु आज भी ऐसे कार्य कुछ बुद्धिवान लोगो द्वारा किये जाते हैं 

  • विद्यालयों में नव कक्षाओं में शिक्षा 1 चैत्र के आस पास आरम्भ की जाती है ।
  • कुछ विद्यालयों में नववर्ष पर यज्ञ आयोजित किया जाता है जिसमे पाठशाला में आये नव छात्र वं छात्राओं को सिम्मलित किया जाता है।
  • भारत का आर्थिक विभाग वं आयकर विभाग अप्रैल भाव चैत्र शुक्ल पक्ष में ही नव कर आयोजित करता है।
  • कुछ गुरु जनों द्वारा चैत्र माह में ही गुरु धारण संस्कार करवाया जाता है तथा मूल मंत्र दिया जाता है। आदि।