सम्भोग में अनिवार्य है कि कोई कुंठा उत्पन्न नहीं हो और संतानोत्पत्ति की बाधाएं भी समाप्त हो जाएंगी। इसके लिए दोनों पक्षों को चाहिए कि वह पहले अपना यह विचार बनाएं कि वह योग्य संतान किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए पुरुष का सूर्य स्वर चलना और स्त्री का चंद्र स्वर चलना अनिवार्य होता है। यह क्रिया रात्रि के प्रथम प्रहर से रात्रि के अंतिम प्रहर तक यदि संपन्न होती है तो भविष्य में होने वाली शारीरिक हानि से बचा जा सकता है।


प्रातःकाल स्त्री के स्तनदर्शन और योनिदर्शन, घोर दरिद्रता को प्रदान करने वाले होते हैं। इसी प्रकार प्रातःकाल का संभोग भी अन्य कई प्रकार के रोग, द्वेष, व दुर्भाग्य देने वाला होता है। यह कुकर्म में सम्मिलित होते हैं। मानव को इसका त्याज्य ही उसके सौभाग्य की कुंजी है। प्रातःकालीन चुम्बन ही पर्याप्त है।

पुरुष का सूर्य स्वर चलता हो और उसमें पृथ्वी त्त्व समाहित हो, स्त्री का चंद्र स्वर चलता हो और उसमें जल तत्त्व समाहित हो और रात्रि का प्रथम अथवा द्वितीय प्रहर हो, इसमें की गई कामकेली क्रिया में सदैव कठोर परिश्रमी एवं सफलता के साथ जीने वाले ही प्राणियों का जन्म होता है।

पुरुष का सूर्य स्वर चलता हो और उसमें अग्नि तत्त्व समाहित हो तथा स्त्री का चंद्र स्वर चलता हो और उसमें आकाश तत्त्व समाहित हो और रात्रि का अंतिम प्रहर हो तो ऐसे समय में किया गया संभोग ऐसे पुत्रों-पुत्रियों को जन्म देगा जो छोटी अवस्थाओं में ही घर-बार छोड़कर चले जाएंगे। इससे बचने के लिए प्रत्येक स्त्री सोने से 2 घंटे पूर्व भोजन कर ले तो अत्युत्तम है।

पुरुष का सूर्य स्वर चलता हो और उसमें अग्नि तत्त्व समाहित हो तथा स्त्री का चंद्र स्वर चलता हो और उसमें अग्नि तत्त्व समाहित हो तो ऐसे समय हुई संतान दगाबाज, कुकर्मी होती है।

पुरुष का सूर्य स्वर चलेता हो और उसमें जल तत्त्व समाहित हो तथा स्त्री का चंद्र स्वर चलता हो और उसमें पृथ्वी तत्त्व समाहित हो तो ऐसी संतान कुल को कलंकित करने वाली होगी।

पुरुष का सूर्य स्वर चलता हो और उसमें वायु तत्त्व समाहित हो तथा स्त्री का चंद्र स्वर चलता हो और उसमें जल तत्त्च समाहित हो तो ऐसी संतानें तीर्थ यात्रा
घूमने-फिरने का शौक रखने वाली होती हैं।

पुरुष का सूर्य स्वर चलता हो और उसमें आकाश तत्त्व समाहित हो तथा स्त्री का चंद्र स्वर चलता हो और उसमें जल त्त्व समाहित हो तो ऐसी संतानें पागल, विकलांग व अल्प आयु की होती हैं।

पुरुष का सूर्य स्वर चलता हो और उसमें वायु तत्त्व समाहित हो तथा स्त्री का चंद्र स्वर चलता हो और उसमें वायु तत्त्व समाहित हो तो ऐसी संतानें माता-पिता को अपमानित करने वाली होती हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री-पुरुष में जब-- जब विपरीत स्वरों में एक ही तत्व की व्युत्पत्ति होती है, उसके समागम से जो भी संतान उत्पन्न होगी वह अशुभ लक्षणों वाली व अशुभ फल प्रदान करने वाली होती है। इसलिए स्त्री-पुरुष दोनों को चाहिए कि वह एक-दूसरे के विपरीतार्थक, जो कि आपस में विरोधी होते हैं, उन तत्त्वों में भूलकर भी समागम न करे और यदि करें तो मात्र मनोरंजन के लिए, संतानोत्पत्ति के लिए कदापि नहीं।