इसमें चित्रानुसार हाथ के अंगूठे के अग्रभाग व पास वाली तर्जनी उंगली के अग्रभाग को स्पर्श किया जाता है। योग शास्त्र में इसे ज्ञान मुद्रा के नाम से परिभाषित किया गया है। इसे हमारे मनीषियों ने बहुत अधिक प्रयोग किया है। भगवान बुद्ध, महावीर व अनेक देवी-देवताओं को उनकी तस्वीरों व मूर्तियों में इसी मुद्रा में दर्शाया गया है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में गीता रहस्य इसी मुद्रा में समझाया था ।

इस प्रकार यह मुद्रा अत्यधिक महत्वपूर्ण मुद्रा है। अंगूठा अग्नि तत्व व तर्जनी उंगली वायु तत्व का प्रतीक है। दोनों के संयोग से ज्ञान मुद्रा बनती है और वायु तत्व स्थिर होता है । 
इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से मस्तिष्क की कमियां बिना किसी औषधि के दूर हो जाती है। नींद की अनियमितता, स्मरण शक्ति क्षीण होना, क्रोध, पागलपन आदि विकार दूर हो जाते हैं। इससे व्यक्ति की ग्राह्य शक्ति बढ़ती है- परिणामस्वरूप आसपास के ज्ञान को मस्तिष्क में संग्रहित करने में अप्रत्याशित सफलता मिलती है।  जिन व्यक्तियों की स्मरण शक्ति क्षीण हो गयी है, उन्हें ज्ञान मुद्रा का निरंतर अभ्यास करना चाहिए। 

यौगिक ध्यान अश्रवा समाधि का यह मुद्रा एक आवश्यक अंग है। इसे प्रायः ध्यान के समय प्रयोग में लाया जाता है। इसके निरंतर प्रयोग से हाथों की नसों व धरमनियों में मजबूती आती है। इससे मस्तिष्क अधिक शक्तिशाली व ऊर्जायुक्त होता है। 

एकाग्रता व चित्त की शांति में ज्ञान मुद्रा का बहुत योगदान है। विद्यार्थियों के लिए यह अत्यधिक लाभकारी है। निरंतर प्रयोग से मस्तिष्क के अनेक रोगों में लाभकारी है। अनिद्रा का रोग इसके प्रयोग से अच्छा हो जाता है। क्रोध तथा मानसिक क्षोभ की स्थिति में यदि ज्ञान मुद्रा में बैठा जाए तो शीघ्र लाभ मिलता है तथा चित्त में स्थिरता आती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को ज्ञान मुद्रा के साथ गहरी-गहरी आठ दस सांस लेनी चाहिए। वास्तव में ज्ञान मुद्रा योग की एक प्रधान प्रक्रिया है जो मानव मस्तिष्क के रहस्यमय चमत्कारों को व्यक्त करने की कुंजी है। यह मुद्रा हमारे आज्ञाचक्र को अत्यधिक प्रभावित करती है जिससे व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास व पराशक्तियों में वृद्धि होती है। 

इसके निरंतर अभ्यास से व्यक्ति दूसरे की मन की बातों को आसानी से जान सकता है तथा भूत व भविष्य की घटनाओं को अपने मस्तिष्क पटल पर यथावत देख सकता है। इस मुद्रा के दीर्घ अभ्यास से वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति होती है, जो पराविज्ञान की ज्ञानवृद्धि में निसंदेह सहायक होता है।

-- योगाचार्य विनय पुष्करणा