योग-परिचय

भारतवर्ष में अत्यंत प्राचीन काल से योगाभ्यास करने की पद्धति प्रचलित है। आज से हजारों वर्ष पूर्व हमारे ऋषि-मुनियों ने जन-कल्याण के उद्देश्य से योगशास्त्र की रचना की थी योग का स्वरूप अत्यंत व्यापक है, इसलिए इसे किसी एक परिभाषा में बाँधा नहीं जा सकता।

संस्कृत भाषा का शब्द है, जो 'युज्' धातु से बना है इसका 'योग' अर्थ है मिलाना या जोड़ना। योग द्वारा आत्मा और परमात्मा का एकीकरण होता है। योग को कायों में कुशलता, मन की भावनाओं पर अंकुश लगाने
तथा सत्य की प्राप्ति का साधन भी माना गया है। योग मानव के व्यक्तित्व को पूर्ण रूप से संकलित करने का एक सुव्यवस्थित विज्ञान है। योगशास्त्र वेदों की तरह ही अत्यंत प्राचीन है। वेदों में भी योगशास्त्र का उल्लेख मिलता है। योगशास्त्र एक जीवंत शास्त्र है । योग को अध्यात्म का विज्ञान भी कहा जाता है।

महर्षि पतंजलि ने 'योगसूत्र' में शरीर, मन तथा प्राण की शुद्धि के लिए योग के आठ अंग बताए हैं।  

इसे 'अष्टांग योग' के नाम से जाना जाता है।

ये आठ अंग हैं : यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।  इन अंगों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है:

१. यम :

 'यम' का अर्थ है निग्रह । निग्रह से तात्पर्य है कुछ विशेष प्रकार के कार्य न करना।  यम पाँच हैं : अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। 
मन, वाणी और कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना ही 'अहिंसा' है। 
योग की साधना करने वाले व्यक्ति को अहिंसा का पालन करना चाहिए। मन में जैसा समझा हो, आँख से जो देखा हो और कान से जो सुना हो, उसे उसी रूप में प्रस्तुत कर देने का नाम 'सत्य' है। सत्य जीवन का स्वरूप है। वास्तव में अध्यात्म जीवन के अंतिम सत्य की खोज है । असत्य के मार्ग द्वारा सत्य की नहीं पाया जा सकता। इसलिए योग की साधना करने वाले व्यक्ति को मन, वाणा और कर्म से सत्य का पालन करना जरूरी है।
 'अस्तेय' का अर्थ है मन, वचन और कर्म से चोरी न करना और दूसरे के धन का लोभ न करना। केवल धन ही नहीं, अधिकार, विचार, यश, मान-प्रतिष्ठा आदि पर भी 'अस्तेय' लागू होता है। मानसिक शुद्धि तथा सामाजिक सुखों की दृष्टि से भी 'अस्तेय' का महत्त्व है। 
समस्त इंद्रियों सहित विषय-विकारों पर संयम रखना ही 'ब्रह्मचर्य' है। योग और भोग दोनों विरोधी बातें हैं। भोग में लिप्त रहते हुए योग नहीं हो सकता। 

'अपरिग्रह' का अर्थ है भोग-विलास और संग्रह करने की प्रवृत्ति का त्याग।

२. नियम : 

 नियम भी पाँच हैं : शौच, सतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान ।

 'शोच' का अर्थ है शरीर और मन की पवित्रता। योग में आंतरिक और बाह्य दोनों तरह के शौच आवश्यक हैं। 

अनुकूल और प्रतिकूल दोनों स्थितियों में प्रसन्नचित्त रहने के गुण को 'संतोष' कहा जाता है। संतोष सर्वश्रेष्ठ स्वर्ग तथा उत्तम सुख है। संतोष मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ खजाना है। 

सुख-दुःख, ठंडी-गर्मी जैसे कष्टों को सह कर की जाने वालों तन और मन की साधना को 'तप' कहा जाता है। 
विचार-शुद्धि और ज्ञान-प्राप्ति के लिए विचारों का
जो आदान-प्रदान किया जाता है, उसे 'स्वाध्याय' कहते हैं। 

जबकि मन. वाणी और कर्म से ईश्वर की भक्ति करना और अपने समस्त कर्म ईश्वर को समर्पित जाने से निश्चिंतता का कर देना ही 'ईश्वर- प्रणिधान' है। 
ईश्वर की शरण में अनुभव होता है और मानसिक आरोग्य बना रहता है। मानसिक आरोग्य बने रहने पर अपने आप शारीरिक आरोग्य बना रहता है। ईश्वर की शरण में जाने से आत्मविश्वास दृढ़ होता है। दिव्य आनंद का अनुभव होता है तथा अपनी हीनता का आभास होता है। इससे मनुष्य को अभिमान नहीं होता। इसलिए मनुष्य अभिमान के कारण होने वाले विनाश से बच जाता है।

३ आसन

आसन अष्टांग योग की तीसरी सीढ़ी है । इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि आसन न तो संपूर्ण योग है और न ही योग की अंतिम स्थिति ।
लेकिन यह संपूर्ण योग का अत्यंत महत्त्वपूर्ण भाग है, जिसके अभ्यास से साधक अपने को उच्चतम अभ्यास के लिए तैयार कर सकता है। 
महर्षि पतंजलि के 'योगसूत्र' के अनुसार आसन को 'स्थिरसुखमासनम्' कहा गया है। अर्थात् जिसमें शरीर स्थिर रहे और मन को सुख की प्राप्ति हो,
शरीर की उस स्थिति को 'आसन' कहते हैं। आसन करने से नाड़ियों की शुद्धि, स्वास्थ्य की वृद्धि तथा तन-मन को स्फुर्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार नियमित
आसन करने से शरीर योगाभ्यास के लिए शक्तिशाली बन जाता है। आसन अनेक हैं। लेकिन हमने सामान्य व्यक्ति के स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर ही आसनों की चर्चा की गई है।

४. प्राणायाम

यौगिक क्रियाओं में प्राणायाम का विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण स्थान है। 'प्राणायाम' का शाब्दिक अर्थ है 'प्राण का नियंत्रण'। इस प्रकार
प्राणायाम का उद्देश्य शरीर में स्थित प्राणशक्ति को उत्प्रेरित, संचरित, नियमित एवं सतुलित करना है। इसीलिए प्राणायाम को योग विज्ञान का एक अमोघ साधन माना गया है। जिस प्रकार शरीर को स्वच्छ एवं शुद्ध रखने के लिए स्नान करने की जरूरत होती है, उसी प्रकार मन को स्वच्छ एवं शुद्ध रखने के लिए प्राणायाम की जरूरत होती है।

५. प्रत्याहार :

 जिस अवस्था में इंद्रियाँ अपने बाह्य विषयों से मुक्त हो कर अंतर्मुखी बनती हैं, उस अवस्था को 'प्रत्याहार' कहते हैं। इससे सशक्त मन तथा मनमाना आचरण करने वाली इंद्रियाँ शांत हो जाती हैं। प्रत्याहार से इंद्रियों को पूर्ण रूप से वश में रखा जा सकता है। इतना ही नहीं, इससे ईश्वर की अनंत शक्ति का आभास होता है और साधक ईश्वर में लीन हो जाता है।

६. धारणा

धारणा शब्द का अर् है एकाग्रता। इस प्रकार चित्त की एकाग्रता में वृद्धि करने के लिए जिस साधन की आवश्यकता होती है, उसे धारणा कहते
हैं। धारणा की सहायता से शांत चित्त को किसी एक स्थान पर सफलतापूर्वक केंद्रित किया जा सकता है।

७. ध्यान

धारणा द्वारा चित्त को जिस विषय में लगाना हो, उस विषय में उसे निरंतर लगाए रखना ही 'ध्यान' कहलाता है। ध्यान की सहायता से मन के राजस और तामस 'मल' का नाश होता है तथा सात्विक गुणों का विकास होता है। ध्यान की साधना से वास्तव में सही-गलत और अच्छे-बुरे को परखने
की विवेक-बुद्धि जागृत होती है। तटस्थ भाव से देखने की शक्ति विकसित होती है।

८. समाधि

जब केवल ध्यान की स्थिति का एहसास हो, तब ध्यान से समाधि की स्थिति उत्पन्न होती है। चित्त ध्येयाकार को प्राप्त करता है, ध्यान में तन्मय हो जाता है। व्यवधानों अर्थात् 'सांसारिक प्रलोभनों' के कारण चित्त की एकाग्रता में कमी आ जाती है। इसलिए यथासंभव अवरोधों से दूर रह कर चित्त की एकाग्रता में वृद्धि करनी चाहिए। समाधि ध्यान की चरम सीमा है।

योग के प्रथम पाँच अंगों - यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को 'बहिरंग योग' कहा जाता है। इसी तरह धारणा, ध्यान और समाधि को योगशास्त्र में 'संयम' कहा जाता है। इन आठों अंगों को विवेकपूर्वक जीवन में उतारा जाए, धर्मपरायणता, सदाचारिता तथा सच्चरित्रता आदि उदात्त गुण विकसित होते हैं। साथ ही मनुष्य की मानसिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक उन्नति होती है और
वह संपूर्ण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करता है।